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योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग के गठन के निहितार्थ

Posted By : Mr. Vivek Ojha     Posted Date : Feb 18,15   Hits : 13359    


पृष्ठभूमिः

पिछले कुछ समय से भारतीय जनमानस और बुद्धिजीवियों के मध्य नीति आयोग के गठन की पहल चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बात की जाँच पड़ताल करने की कोशिशें की जा रही हैं कि क्या नीति आयोग नामकरण (Nomenclature) में परिवर्तन मात्र है अथवा भारत के समावेशी विकास के लिए योजना व नीतियों के स्तर पर संस्थागत आधुनिकीकरण (Institutional modernisation) व प्रगतिशीलता की मुहिम है। वस्तुतः भारत की आजादी के बाद से ही भारतीय राजव्यवस्था में विकेन्द्रीकरण, सहभागिता, जन-केन्द्रित नीतियाँ, लोक हित तथा समाज के सभी वर्गों के संतुलित विकास के प्रति भारत सरकार ने अपनी सद्इच्छा (good will) प्रकट की और योजना आयोग के नेतृत्व में देश के सामाजिक-आर्थिक विकास की रूपरेखा तैयार की। योजना आयोग से यह अपेक्षा की गयी कि वह सुनिश्चित करें कि नागरिकों, पुरूषों और महिलाओं को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकार हो। समुदाय के भौतिक संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का बंटवारा ऐसे किया जाये जिससे ये आम हितों के लिए उपयोगी हों। आर्थिक प्रणाली के संचालन में धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण न हो जिससे आम क्षति न हो सके। 

योजना आयोग बनाम नीति आयोग की बहस में गहराई तक जाने से पहले मार्च 1950 में गठित योजना आयोग की प्रकृति एवं भूमिका को समझना आवश्यक है। 15 मार्च, 1950 को गठित योजना आयोग एक संविधानेत्तर निकाय है जिस पर वैधानिक रूप से कोई संवैधानिक प्रतिबद्धताएँ नहीं हैं। इसका गठन भारत सरकार के एक ‘मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव’ के जरिये किया गया था। एक प्रकार से यह गैर संवैधानिक राजनीतिक संस्था है। इसके अतिरिक्त यह एक सलाहकारी, परामर्शदात्री निकाय है। भारतीय योजना का ढांचा सोवियत संघ के समाजवादी आदर्शों से प्रेरित था लेकिन निर्धनता, बेरोजगारी, असाक्षरता व संसाधनों के अभाव से घिरे भारत द्वारा आजादी के साथ ही मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) का ढांचा विकास हेतु अपनाया गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद निर्मित योजना आयोग को निम्नांकित भूमिकाएँ प्रदान की गयीं :

  • देश की भौतिक, पूंजी और मानव संसाधनों का तकनीकी कार्मिकों (personnel) सहित मूल्यांकन करना और देश की जरूरतों के अनुरुप कम पाये जाने वाले संसाधनों में वृद्धि की संभावनाओं का पता लगाना तथा देश के संसाधनों के सर्वाधिक प्रभावी और संतुलित उपयोग के लिए योजना तैयार करना।

  • प्राथमिकताओं के निर्धारण के संबंध में उन चरणों की परिभाषा करना जिनमें योजना को पूरा किया जाना चाहिए और प्रत्येक चरण के पूरे किये जाने के लिए संसाधनों का आबंटन।

  • उन कारकों का उल्लेख करना जिनसे आर्थिक विकास में बाधा पहुँच रही हो और उन स्थितियों का निर्धारण करना जिन्हें योजना के सफल कार्यान्वयन हेतु वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए स्थापित किया जाना चाहिए।

  • ऐसी मशीनरी की प्रकृति का निर्धारण करना जो योजना के सभी पहलुओं की दृष्टि से ‘प्रत्येक चरण के सफल कार्यान्वयन’ को हासिल करने के लिए जरुरी हों।

  • योजना के प्रत्येक चरण के कार्यान्वयन में हुई प्रगति का समय-समय पर मूल्यांकन करना और नीतियों तथा उपायों के समायोजन की सिफारिश करना जो ऐसे मूल्यांकन के अनुसार जरुरी समझे जाएँ।

  • ऐसी अंतरिम अथवा सहायक सिफारिशें तैयार करना जो सौंपी गई ड्यूटी को पूरा करने की सुविधा के लिए या तो उपयुक्त प्रतीत होती हो अथवा मौजूदा आर्थिक स्थितियों पर विचार करने के संबंध में, चालू नीतियों, उपायों और विकास कार्यक्रमों या केन्द्र या राज्य सरकारों द्वारा सलाह के लिए संदर्भित की जाने वाली ऐसी विशिष्ट समस्याओं की जाँच के लिए जरुरी हो।

रूपांतरणकारी भारत के निर्माण में नीति आयोग की भूमिकाः

जिस परंपरागत योजना आयोग ने भारत की समूची नियोजन प्रणाली (Planning System) का प्रतिनिधित्व किया, वह कई खामियों के चलते निरीक्षण एवं परीक्षण के दायरे में आया। योजना आयोग की उपस्थिति के आधार पर ही भारतीय संविधान को ‘एकात्मक शासन प्रणाली वाले संघवाद’ के रूप में देखा गया है। योजना आयोग की प्रकृति, स्वरूप व कार्यों के आधार पर ही भारतीय संविधान को ‘अर्ध-संघीय’ तक कह देने का प्रयास किया गया हैं। वस्तुतः अपनी स्थापना के शुरूआती चरण में योजना आयोग ने भारी उद्योगों के विकास व साथ ही कृषि पर बल दिया लेकिन बेहतर ढंग से आर्थिक संवृद्धि, रोजगारपरकता, निर्धनता उन्ममूलन में सफल नहीं हो सका। देश में मानव संसाधन विकास व सामाजिक न्याय के साथ विकास की प्रक्रिया देर से प्रारंभ हुई। देश की अंतरक्षेत्रीय व अंतराक्षेत्रीय विषमताओं (राज्यों के स्तर पर) को मिटाने में योजना आयोग की भूमिका संतोषजनक नहीं रही है। इसीलिए बदलते भारत के लिए नियोजन प्रणाली का आधुनिकीकरण जरूरी है।

योजना आयोग की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाने के आधार -

पिछले 67 वर्षों में योजना आयोग की भूमिका, उसकी कार्यविधि पर अलग-अलग तरीकों से प्रश्न उठाये गये हैं। कभी इसे सुपर कैबिनेट का नाम दिया गया तो कभी इसे मंत्रिमंडलीय तानाशाही का अभिकरण माना गया। कुछ विद्वानों ने योजना आयोग की वैधता पर इस आधार पर सवाल खड़े किये कि इसने भारतीय संघवाद की मूल आत्मा पर चोट कर विकेन्द्रीकरण की बजाय शक्तियों के केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया है। बुद्धिजीवियों का एक अलग वर्ग कहता है कि संविधान द्वारा सृजित व परिभाषित न होने के चलते योजना आयोग एक ‘विशेषज्ञ राजनीतिक संस्था’ के रूप में सक्रिय हुआ है। वहीं सत्ताधारी दल द्वारा योजना आयोग में की गयी राजनीतिक नियुक्तियाँ योजना आयोग के राजनीतिकरण (politicisation of planning commission) में सहायक रही हैं। विचारणीय है कि योजना का निर्माण, उसके विविध चरण, उपलब्ध संसाधन व अवरोध, क्रियान्वयन, निगरानी व योजना की सफलता एक सामान्य नहीं बल्कि विशेषज्ञता, दक्षता व कुशलता पर आधारित गतिविधियाँ हैं। योजना आयोग के ऊपर इन मानकों के उल्लंघन के आरोप लगाये जाते रहे हैं। योजना आयोग की सार्थकता व प्रासंगिकता पर जिन आधारों पर सवाल खड़े किये जाते हैं, वे निम्नवत् हैं :

(क) योजना आयोग बनाम वित्त आयोग : यह सुस्पष्ट है कि योजना आयोग एक ‘गैर संवैधानिक संस्था’ है जिसकी भूमिकाएँ देश के विकास के लिए योजनाओं के निर्माण (पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से) तथा उनके क्रियान्वयन पर केन्द्रित हैं। वहीं दूसरी तरफ वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था (अनु. 280 के तहत) है, जिसका प्रमुख कार्य केन्द्र व राज्यों के मध्य देश के राजस्वों का बँटवारा व राज्यों को अनुदान देना है। संविधान के अनु. 282 में मूलतः यह व्यवस्था है कि ऐसी आकस्मिक परिस्थितियों जैसे बाढ़, सूखा, भूचाल तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती, का सामना करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा अनुदान दिया जा सकता है जो केन्द्र सरकार की इच्छा पर निर्भर करेगा और जो अनु. 275 के तहत वित्त आयोग द्वारा दिये जाने वाले अनुदान से भिन्न होगा।

1950 में जब योजना आयोग बना तो अनु. 282 के तहत उससे कहा गया कि वह राज्यों को योजना के उद्देश्यों से अनुदान दें। स्पष्ट है कि योजना आयोग जिस अनु. 282 के तहत योजना अनुदान देता है, वह मूलतः इससे संबंधित नहीं है। भारतीय संविधान के अनु. 282 को अधिक स्पष्टता के साथ देखने पर पता चलता है कि संघ या राज्य किसी लोक प्रयोजन (Public Purpose) के लिए कोई अनुदान इस बात के होते हुए भी दे सकेगा कि वह प्रयोजन ऐसा नहीं है, जिसके संबंध में, यथास्थिति, संसद या उस राज्य का विधान-मंडल विधि बना सकता है। इस प्रकार अनु. 282 संघ या राज्य द्वारा उनके अपने राजस्व से व्यय करने के संबंध में प्रावधान करता है। अतः स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार जिसकों अपने राजस्व से व्यय करने के संबंध में अनु. 282 के तहत् जो संवैधानिक शक्ति दी गयी, वह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के शुरुआती विकास काल में ही योजना आयोग के हाथ में आ गया। मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव से निर्मित योजना आयोग व्यावहारिक रूप में केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि बनकर राज्यों को अनुदान देने, नीति-निर्माण आदि दृष्टियों से अनन्य शक्तियों (Exclusive Powers) का इस्तेमाल करने लगा। 

योजना आयोग को भारतीय नियोजन प्रणाली, राज्यों के विकास के मानकों को तय करने में अति सक्रिय भूमिका निभा पाने का अवसर भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) की जमींनी सच्चाईयों के चलते मिला। स्वंतत्र भारत की पहली जमींनी राजनीतिक सच्चाई थी कि देश में वन पार्टी सिंड्रोम (One Party Syndrome) अथवा वन पार्टी डोमिनेन्ट सिस्टम (One Party Dominant System) था। भारतीय राजव्यवस्था के विशेषज्ञ मारिस जोन्स ने इसे ऐसे कारक के रूप में बताया जहाँ प्रतिस्पर्द्धा के साथ-साथ प्रभुत्व विद्यमान था लेकिन विकल्प की खोज (Dominance Coexisting With Competition but Without a Trace of Alteration) मौजूद न थी। कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल को स्वतंत्र भारत में प्राप्त अनन्य शक्ति और प्रभुत्व की स्थिति ने 1950 व 1960 के दशक में सहयोगी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को साकार नहीं होने दिया। 60 के दशक में भारतीय राजव्यवस्था को ‘मारिस जोन्स’ द्वारा सौदेबाजी संघवाद (Bargaining Federalism) के रूप में निरुपित किया गया। इन बहसों ने भारत में योजना आयोग की केन्द्रीकृत भूमिका को अधिक सुदृढ बनाने में मदद किया। अनेक लोगों ने और 11वें वित्त आयोग ने विशेष रूप से योजना आयोग द्वारा राज्यों को दिये जाने वाले अनुदान के संबंध में जो कुल हस्तांतरण का 30 से 35 प्रतिशत आता है, पर आपत्ति उठायी है। इस प्रकार योजना और अनुदान के कार्यों व उनसे संबंधित अधिकारों के घालमेल से ‘योजना आयोग बनाम वित्त आयोग का विवाद’ शुरू हुआ।

‘आर्थिक सर्वेक्षण 2013-14’ के अनुसार, इस समय भारत में किसी सरकारी विभाग को दो तंत्रों से संसाधन प्राप्त होता हैः बजट प्रक्रिया जो कि वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार की जाती है और दूसरी बजट प्रक्रिया जो कि योजना आयोग द्वारा तैयार की जाती है। इससे दोनों के ही उत्तरदायित्व में घाल-मेल हो जाता है और बजट कार्य में बार-बार असफलता आ जाती है क्योंकि ऐसा कोई बिन्दु नहीं होता है जहाँ कि बजट कार्य में सख्ती से निर्णय लिये जा सकें। ‘आर्थिक सर्वेक्षण, 2013-14’ का कहना है कि एक और अधिक कारगर बजट प्रक्रिया अपनाई जा सकती हैं जिसको कि परिणाम, लक्ष्य या वैकल्पिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दृष्टि से पूरा किया जा सकता है। एक ठोस बजट प्रक्रिया में हमारा ध्यान ऐसे परिणाम पर जाना चाहिए जो कि नागरिकों को मालूम पड़े या स्वतंत्र निकायों द्वारा जिनका मापन हो सके अर्थात् हमें सरकारी विभागों के आंतरिक क्रियाकलापों पर बहुत जोर नहीं देना चाहिए। बजट आबंटन को हमें ठोस लक्ष्य के साथ जोड़कर देखना चाहिए। सर्वे 2013-14 में बजट प्रक्रिया की समूची जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय को सौंपने की सिफारिश की गयी है।

(ख) योजना आयोग की सदस्यता का राजनीतिकरण :

योजना आयोग की संरचना पर गौर करें तो ‘प्रधानमंत्री’ योजना आयोग का ‘पदेन अध्यक्ष’ होता है। इसके अलावा आयोग में एक उपाध्यक्ष, तीन पूर्ण कालिक तथा तीन अंशकालिक तथा पदेन सदस्य होते हैं। वित्तमंत्री, विदेशमंत्री, कृषि मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, रासायनिक उवर्रक मंत्री आदि इसके पदेन सदस्य होते हैं। उपाध्यक्ष को कैबिनेट स्तर के मंत्री तथा सदस्यों को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त होता है। उल्लेखनीय है कि योजना आयोग का गठन एक परामर्शकारी निकाय के रूप में किया गया था लेकिन समय के साथ यह प्रधानमंत्री व वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों की सम्बद्धता के चलते एक सर्वाधिकारवादी संस्था (Authoritative institution) के रूप में परिवर्तित हो गया। इसका परामर्शकारी आयाम नजरअंदाज कर दिया गया और सरकारी महकमे में इसने सबसे अहम स्थान पा लिया। योजना आयोग ने इस स्तर पर शक्ति व प्रभाव पा लिया कि भारत सरकार इसकी पूर्व सहमति के बिना विकासात्मक कार्यक्रमों की पहल व क्रियान्वयन नहीं कर सकती थी।

(ग) अनुचित व्यय एवं अनुपयुक्त तथा अवास्तविक आंकड़ों का प्रकाशन :
हाल के समय में योजना आयोग की अनुचित व्यय तथा निर्धनता रेखा के संदर्भ में अवास्तविक प्रतीत होने वाले आंकड़ें देने के चलते आलोचनाएँ की गयी। योजना आयोग की शौचालयों के दो ब्लाकों को पुर्ननवीकृत करने में 3.5 मिलियन रू. (58,000 अमेरिकी डॉलर) खर्च कर डालने पर आलोचना की गयी। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में 859.6 रू. (14 डॉलर) व ग्रामीण क्षेत्रों मे 672.8 रू. (11 डॉलर) को मासिक उपभोग के आधार पर निर्धनता रेखा का मानक तय करने के चलते भी इसकी आलोचना हुई। योजना आयोग द्वारा निर्धनता रेखा पर दिया गया यह आंकड़ा आम लोगों से लेकर बुद्धिजीवियों तक को अविश्वसनीय और भ्रामक लगा।


उल्लेखनीय है कि प्रो. एम. आर. मसानी ने योजना आयोग को सुपर कैबिनेट (Super Cabinet) कहा था। उन्होंने आरोप लगाया था कि योजना आयोग के सदस्य शासन-प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप करते हैं। कई लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री का योजना आयोग के अध्यक्ष होने के नाते अन्य सदस्यों को मुक्त रूप से विचारों को व्यक्त करने का अवसर नहीं मिल पाता। डी. आर. गाडगिल ने योजना आयोग के सदस्यों का शक्ति और संरक्षण (power and patronage) के प्रति स्वाभाविक रूझान बताया।

योजना आयोग की इस आधार पर भी आलोचना की गयी है कि इसमें ‘विशेषज्ञता का अभाव’ (lack of specialization) है। इसमें वित्तीय विशेषज्ञ नहीं होते और आर्थिक मुद्दों से उपयुक्त तरीके से निपटने की तकनीक इसमें नहीं है। योजना आयोग के पास लोकप्रिय समर्थन (popular support) का भी अभाव है। यह आरोप लगाया गया है कि जन भावनाओं, संवेदनाओं से परे यह आयोग मंत्रियों व उच्च अधिकारियों का क्लब बन गया है। 

योजना आयोग के स्थान पर एक नये आयोग के प्रश्न पर ‘स्वतंत्र मूल्यांकन कार्यालय’ की रिपोर्टः 

वर्ष 2013 में सरकार के कार्यक्रमों, संस्थाओं व नीतियों की प्रभावशीलता (effectiveness) के आंकलन के लिए योजना आयोग द्वारा ‘स्वतंत्र मूल्यांकन 
कार्यालय’ (Independent Evaluation office) का गठन किया गया था। इस कार्यालय के महानिदेशक अजय छिब्बर ने पहली रिपोर्ट भारतीय प्रधानमंत्री को सौंपी जिसमें योजना आयोग को एक नये आयोग के साथ प्रतिस्थापित करने की सिफारिश की गयी है। इस कार्यालय ने नये आयोग को एक ‘थिंक टैंक’ के रूप में निरुपित किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना आयोग एक ‘कंट्रोल कमीशन’ के रूप में है जो अपने वर्तमान स्वरूप व कार्यों के साथ भारत के विकास में सहायक नहीं है। कार्यालय ने कहा है कि योजना आयोग अपने प्राधिकार से परे कार्य करता रहा है। राज्य सरकारों को वित्त के आबंटन में भी यह निष्पक्ष भूमिका नहीं निभा पाया है। इसलिए राज्यों को वित्त आबंटक के रूप में इसकी भूमिका को वित्त मंत्रालय को सौंपने की सिफारिश कार्यालय द्वारा की गयी है। इसने यह भी कहा कि केन्द्रीय मंत्रालयों के मध्य संसाधनों के आबंटन की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय को सौंपी जानी चाहिए। स्वतंत्र मूल्यांकन कार्यालय का कहना था कि नये आयोग को ‘रिफार्म्स एंड सोल्यूशन्स कमीशन’ नाम दिया जा सकता है। इस आयोग में योजना आयोग के विशेषज्ञता के अभाव वाले सदस्यों की बजाय दक्ष, कुशल व विषय में पारंगत विशेषज्ञ सदस्य होने चाहिए।

योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) का गठनः 



भारत सरकार ने हाल ही में योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) नामक नयी संस्था का गठन किया है। यह संस्थान सरकार के थिंक टैंक के रूप में सेवाएँ प्रदान करेगा और उसे निर्देशात्मक एवं नीतिगत गतिशीलता प्रदान करेगा। यह केन्द्र और राज्य स्तरों पर सरकार को नीति के प्रमुख कारकों के संबंध में प्रासंगिक महत्वपूर्ण एवं तकनीकी परामर्श उपलब्ध करायेगा। इसमें आर्थिक मोर्चे पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आयात, देश के भीतर, साथ ही साथ अन्य देशों की बेहतरीन पद्धतियों का प्रसार, नये नीतिगत विचारों का समावेश और विशिष्ट विषयों पर आधारित समर्थन से संबंधित मामलें शामिल होंगे। नीति आयोग से संबंधित नये प्रस्ताव (New resolution) के मुख्य पहलू निम्नवत् हैंः

  • शासन और नीति के संस्थानों को नई चुनौतियों को अपनाने की जरूरत पर बल।

  • भारत के नागरिकों को शासन और गतिशील नीति बदलावों में संस्थागत सुधारों की जरूरत।

  • इस बात को ध्यान में रखकर कार्य करने की जरूरत है कि लगभग 65 वर्षों के बाद देश ने खुद में एक अर्धविकसित अर्थव्यवस्था से एक उभरते वैश्विक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में आमूल-चूल परिवर्तन किया है।

  • भारत की विविधता, बहुलता का सम्मान करते हुए केन्द्र-राज्य स्वस्थ संबंधों के निर्माण में नये संस्थान की भूमिका पर बल।

नीति आयोग की संरचनाः 

भारीतय प्रधानमंत्री इस आयोग के अध्यक्ष होंगे जबकि इसकी गवर्निंग काउंसिल में राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे। विशिष्ट मुद्दों और ऐसे आकस्मिक मामले जिनका संबंध एक से अधिक राज्य या क्षेत्र से हो, को देखने के लिए क्षेत्रीय परिषद् (regional council) गठित की जायेगी। ये परिषदें विशिष्ट कार्यकाल के लिए बनाई जायेगी। इन परिषदों की बैठक भारत के प्रधानमंत्री के निर्देश पर होगी और इनमें संबंधित क्षेत्र के राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे। इन परिषदों की अध्यक्षता नीति आयोग के उपाध्यक्ष करेंगे। संबंधित कार्य क्षेत्र की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञ और कार्यरत लोग, विशेष आमंत्रित के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा नामित किये जायेंगें। पूर्णकालिक संगठनात्मक ढाँचे में (प्रधानमंत्री के अध्यक्ष होने के अलावा) निम्नांकित लोग शामिल होंगे।

  • प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त उपाध्यक्षः हाल ही में ‘अरविंद पनगढ़िया’ को नीति आयोग का पहला उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

  • दो पूर्णकालिक सदस्यः अर्थशास्त्री ‘बिबेक देबराय’ और वैज्ञानिक ‘वी.के.सारस्वत’

  • अंशकालिक सदस्य के रूप में अग्रणी विश्वविद्यालय शोध संस्थानों और संबंधित संस्थानों से अधिकतम दो पदेन सदस्य होंगे जिनकी सदस्यता क्रमिक अथवा चक्रीय आधार पर होगी।

  • पदेन सदस्य : केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् से अधिकतम 4 सदस्य प्रधानमंत्री द्वारा नामित होंगे। यदि बारी के आधार को प्राथमिकता दी जाती है तो यह नियुक्ति विशिष्ट कार्यकाल के लिए होंगी।

  • मुख्य संचालन अधिकारीः भारत सरकार के सचिव स्तर के अधिकारी को निश्चित कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त किया जाएगा। हाल ही में ‘सिंधु श्री खुल्लर’ को नीति आयोग का पहला मुख्य संचालन अधिकारी नियुक्त किया गया है।

  • आवश्यकतानुसार नीति आयोग के लिए सचिवालय होने का प्रावधान किया गया है।

नीति आयोग के उद्देश्यः 

नीति आयोग निम्नांकित उद्देश्यों के लिए कार्य करेगा।

  • सशक्त राज्य ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। इस तथ्य की महत्ता को स्वीकार करते हुए राज्यों के साथ सतत आधार पर संरचनात्मक सहयोग की पहल और तंत्र के माध्यम से ‘सहयोगपूर्ण संघवाद’ को बढ़ावा देना।

  • राष्ट्रीय उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए राज्यों की सक्रिय भागीदारी के साथ राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं, क्षेत्रों और रणनीतियों का एक साझा दृष्टिकोण विकसित करना। यह ‘राष्ट्रीय एजेंडा’ का उपयुक्त प्रारूप प्रस्तुत करेगा।

  • आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि जो क्षेत्र विशेष रूप से उसे सौंपे गये हैं उनकी आर्थिक कार्य नीति और नीति में राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त यह आयोग ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजना तैयार करने के लिए तंत्र विकसित करेगा और इसे उत्तरोत्तर उच्च स्तर तक पहुंचायेगा।

  • आवश्यक संसाधनों की पहचान करने सहित कार्यक्रमों और उपायों के कार्यान्वयन के सक्रिय मूल्यांकन और सक्रिय निगरानी की जायेगी ताकि सेवाएँ प्रदान करने में सफलता की संभावनाओं को प्रबल बनाया जा सके।

  • महत्तवपूर्ण हितधारकों तथा समान विचारधारा वाले राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक और साथ ही साथ शैक्षिक और नीति अनुसंधान संस्थानों के बीच भागीदारी को परामर्श और प्रोत्साहन देगा। इसके अलावा यह आयोग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों, प्रैक्टिशनरों तथा अन्य हितधारकों के सहयोगात्मक समुदाय के जरिये ज्ञान, नवाचार, उद्यमशीलता सहायक प्रणाली बनायेगा।

  • अत्याधुनिक कला संसाधन केन्द्र बनाना जो सुशासन तथा सतत और न्यायसंगत विकास की सर्वश्रेष्ठ कार्यप्रणाली पर अनुसंधान करने के साथ-साथ हितधारकों तक जानकारी पहुँचाने में भी मदद करेगा। इसके अलावा यह विकास के एजेंडे के कार्यान्वयन में तेजी लाने के क्रम में अंतर-क्षेत्रीय और अंतर विभागीय मुद्दों के समाधान के लिए एक मंच प्रदान करेगा। 

नीति आयोग की प्रथम बैठक और नव-नियोजन युग की शुरुआत 

फरवरी, 2014 में नीति आयोग की प्रथम बैठक के आयोजन के साथ ही भारतीय प्रधानमंत्री ने राज्यों को तमाम मतभेदों को भुलाकर ‘सहयोगी संघवाद’ के मॉडल को भारतीय संदर्भों में सफल बनाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने बैठक में निर्धनता उन्मूलन को सबसे बड़ी चुनौती के रूप में निरुपित किया। बैठक में केन्द्र सरकार का मत था कि राज्यों के सहयोग के बिना देश को प्रगति पथ पर नहीं ले जाया जा सकता। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सहयोग व समन्वय के साथ भारत के अभिन्न अंग के रूप में विकास के मार्ग पर बढ़ने की बात की गयी।




बैठक में कहा गया कि नीति आयोग को राष्ट्र की आवश्यकताओं का सही ढंग से आंकलन करते हुए कार्य करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए। वस्तुतः लोक सभा व राज्य विधान सभाओं के चुनावों में जिस प्रकार से पूर्ण बहुमत वाली सरकारों के पक्ष में स्पष्ट जनादेश आने लगा है वह भारतीय राजनीति व्यवस्था को तमाम विकृतियों से दूर रखने वाले सुअवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि गठबंधन सरकार व राजनीति वाले युग ने भारतीय राज्यों को उनके जायज हक से वंचित किया। सत्ताधारी दल के करीबी राज्यों को विशेष समर्थन देने में योजना आयोग ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और यह सब व्यावहारिक स्तर पर कटु  राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दायरे में रहकर किया गया। अब भारतीय राजव्यवस्था को लोकमित्र (Public Friendly) राज्य-मित्र शासन व्यवस्था की जरुरत है और यही नीति आयोग को औचित्यपूर्ण ठहराने का वैध आधार भी है।  

योजना आयोग के प्रतिस्थापन (Replacement) के निर्णय का समीक्षात्मक मूल्यांकन 

राष्ट्र के विकास, राज्यों के संतुलित विकास के संदर्भ में अंर्तक्षेत्रीय व अंतराक्षेत्रीय समानता के सिद्धांत का पालन, लोककल्याणकारी राज्य के आदर्शों का निष्पादन, देश की जरुरतों का समय व देशकाल के अनुरुप सही आंकलन करने की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन से संबंधित महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की होती है। इन संस्थाओं की संरचना व प्रकार्यों की रुपरेखा निर्धारित करने के क्रम में बरती गई सावधानी ही इन्हें पारदर्शी व जवाबदेह बना सकती है। ऐसा देखा गया है कि भारत, राष्ट्र-राज्य विकास के लिए जिम्मेदार संस्थाओं व संगठनों के निर्माण में पारदर्शिता और जवाबदेहिता निर्धारित करने वाले मानदंडों को निर्मित करने, साथ ही उनका पालन करने में पर्याप्त रूप से सफल नहीं हो पाया है। इसलिए भारतीय शासन तंत्र को इस बात को समझने की जरुरत है कि लोक हित व राज्यों का संतुलित विकास विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक कार्य न होकर प्रशासनिक जिम्मेदारी वाला कार्य है। यहां यह भी विचारणीय है कि एक संस्था के स्थान पर दूसरी संस्था बना देने अथवा उसका नाम परिवर्तित कर देने मात्र से भारतीय नियोजन प्रणाली (Indian Planning System) की सारी विकृतियां दूर नहीं हो जायेगी। 

नीति आयोग को यह समझना होगा कि योजना अथवा नियोजन एक बहुआयामी प्रक्रिया है। राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र को बेहतर ढंग से फलने-फूलने के लिए ठोस योजनाओं व नीतियों की जरुरत है। केन्द्र व राज्य दोनों को ही आज जलवायु परिवर्तन से निपटने की नीति, वन्य जीवों की अवैध तस्करी नियंत्रण से संबंधित नीति, ऊर्जा के नये स्रोतों को तलाशने की नीति, भारतीय युवाओं को उद्यमी व नवाचारी बनाने की नीति, नक्सलवाद तथा वामपंथी उग्रवाद से निपटने की रणनीति, जल संकट समाधान व नदी जल विवादों के निस्तारण व प्रबंधन की नीति के परिप्रेक्ष्य में ‘समेकित नियोजन प्रणाली’ (Integrated Planning System) के बारे में सोचना व कार्य करना होगा। कुछ ऐसा करना होगा की विकास का वास्तविक लोकतंत्र घर वापस लौट आये।


आज केन्द्र व राज्य की समस्याएं सांझी है, इनका सांझा समाधान नीति आयोग के तत्वावधान में दृढ़ राजनीतिक व समतामूलक विकासात्मक इच्छा शक्ति पर निर्भर करेगा। कुल मिलाकर ‘सत्ता सुख प्राप्ति अथवा सत्ता सुख दात्री’ की धारणा में अगले का चयन ही किसी सकारात्मक इच्छा शक्ति को पैदा कर सकेगा।

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