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मालदीव का नया राजनीतिक संकटः समस्या एवं विविध आयाम

Posted By : Mr. Vivek Ojha     Posted Date : Feb 28,15   Hits : 5179    

हाल ही में मालदीव के विपक्षी दल के नेता और भूतपूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को आतंकवाद व देशद्रोह के दोषी के रूप में गिरफ्तार कर लिये जाने से मालदीव में राजनीतिक संकट एक बार फिर से गहरा गया है। लोकतंत्र समर्थक नशीद की गिरफ्तारी से मालदीव में लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली हो पाने में काफी समस्याएं हैं। वर्ष 2012 में एक वरिष्ठ न्यायाधीश अब्दुल्ला मोहम्मद को गिरफ्तार करने का आदेश ही वर्ष 2015 में मोहम्मद नशीद की गिरफ्तारी का आधार बना है। न्यायाधीश पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत मुकदमा चलाया गया था लेकिन विरोधियों का तर्क है कि गिरफ्तारी की वजह को नशीद सरकार द्वारा स्पष्ट नहीं किया गया है। यामीन अब्दुल गयूम जो कि मालदीव में 30 वर्षों तक शासन करने वाले मौमून अब्दुल गयूम के चचेरे भाई हैं, को नशीद के खिलाफ जानबूझकर षड्यंत्र रचने का साजिशकर्ता माना गया है। भूतपूर्व राष्ट्रपति नशीद द्वारा भारत से मदद मांगने पर भारत ने तटस्थता की नीति अपनाये रखी है। मालदीव के घरेलू मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप भारत के खिलाफ चीन, पाकिस्तान व मालदीव को आक्रोशित कर सकता है। भारत मानवाधिकार मूल्यों व लोकतांत्रिक प्रणाली की बहाली की अपेक्षा तो कर सकता है, लेकिन किसी देश को इसके बाध्य नहीं कर सकता, और न ही कभी उसने ऐसा किया है। यद्यपि भारत ने सदैव किसी अन्य देश के घरेलू एवं आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप की नीति अपनायी है, किसी भी राजनीतिक संकट के शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपील की है लेकिन जब कोई पड़ोसी देश किसी अन्य देश का प्लेइंग कार्ड बनकर भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने की संभावना रखता हो, तो ऐसे में भारत के यथार्थवादी विदेशी नीति निर्माणकर्ताओं से ‘कुशल राजनय’ (Tactful Diplomacy) अपनाने की अपेक्षा करना जरुरी है। ऐसा माना जा रहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समक्ष सत्ता में आने के बाद नशीद की गिरफ्तारी के रूप में पहला क्षेत्रीय संकट अथवा चुनौती उत्पन्न हुई है। नशीद की गिरफ्तारी से लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों के संरक्षण की मुहिम को झटका लगेगा। राष्ट्रपति नशीद इस्लाम के उदारवादी चेहरे को सामने रख कर कार्य करने वालों में से माने जाते हैं जबकि अन्य राजनीतिक दल, वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन और भूतपूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल्ला गयूम इस्लामी मूल्यों के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। नशीद को लोकतंत्र, विकास और कूटनीति की पुनर्बहाली करने वाले दूरदर्शी नेता के रूप में जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008 में राष्ट्रपति नशीद ने जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे को देखते हुए लोगों में जागरुकता व एकजुटता का संदेश देने के उद्देश्य से समुद्र के अंदर कैबेनिट मंत्रियों की बैठक आयोजित करवायी थी। इस स्तर की गंभीरता व संवेदनशीलता का कोई उदाहरण राष्ट्रपति गयूम के शासनकाल में नहीं देखा गया था। 

वर्ष 2013 के चुनावों में नशीद द्वारा लिबरल इस्लाम की बात पर जोर दिया गया जबकि अन्य दलों ने इन चुनावों में इस्लामिक कार्ड का प्रयोग किया। जम्हूरी पार्टी (Jumhoree Party) ने तो इन चुनावों में इस्लाम की रक्षा की अपील की। इस प्रकार इन दलों के निहित स्वार्थों ने मालदीव में इस्लामी उग्रवाद (Islamic Extremism) का मार्ग प्रशस्त करने में भूमिका निभायी। नशीद का दृष्टिकोण कुछ इस तरह का न होने के चलते उन्हें सत्ता में बने रहने को उनके विरोधियों ने एक गंभीर खतरे के रूप में देखा। मालदीव के वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन का भी नशीद के लिए कुछ ऐसा ही दृष्टिकोण है जिसके चलते उनके खिलाफ साजिशें रचने का दौर जारी हैं न्यायालय ने उन्हें जमानत देने से मना कर दिया है। भारत सरकार के समक्ष यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें हर एक कदम काफी सर्तक होकर उठाना पड़ेगा।

 

मालदीव संकट इतिहास के आइने से


मालदीव दक्षिण एशिया में हिन्द महासागर के तट पर स्थित अटालों (Atolls) का समूह है। यह भारत के दक्षिण-दक्षिण पश्चिम में अवस्थित है। यह श्रीलंका के दक्षिण पश्चिम में और विषुवत रेखा (Equator) के उत्तर में स्थित है। 12वीं शताब्दी में यहां इस्लाम का चलन शुरू हुआ। 15वीं शताब्दी में पुर्तगाल का इस पर आधिपत्य रहा। कालांतर में 17वीं शताब्दी में यह सिलोन (श्रीलंका) के डच शासकों का संरक्षित क्षेत्र (Protectorate) बन गया और ब्रिटिश लोगों द्वारा सिलोन (Ceylon) पर नियंत्रण करने के साथ ही 1796 में मालदीव पर ब्रिटेन का प्रभुत्व हो गया। 1887 में औपचारिक रूप से मालदीव को आंतरिक रूप से स्वप्रशासित ब्रिटिश संरक्षित क्षेत्र (Internally Self-Governing British Protectorate) का दर्जा मिला। वर्ष 1932 में मालदीव के पहले लोकतांत्रिक संविधान की उद्घोषणा की गयी। अब मालदीव में प्रचलित सल्तनत (Sultanate) व्यवस्था एक निर्वाचित पद (Elected Position) के रूप में हो गयी। सुधार का क्रम जारी रहा और 1953 में कामनवेल्थ के तहत् मालदीव एक गणतंत्र बन गया और सल्तनत का उन्मूलन हो गया। वर्ष 1965 में कामनवेल्थ से बाहर मालदीव को सल्तनत के रूप में पूर्ण आजादी मिली। वर्ष 1968 में जनमत संग्रह (Referendum) के जरिये सुल्तान को पद से हटाया गया और ‘इब्राहिम नासिर’ राष्ट्रपति बने। 1978 में नासिर के सेवानिवृत्त होने के बाद मौमून अब्द अल-गयूम (Maumoon Abdal-Gayoom) राष्ट्रपति बने जो कई दशकों तक (वर्ष 2008 तक) मालदीव के राष्ट्रपति बने रहे। 1980 के दशक में पर्यटन उद्योग के विकास से आर्थिक संवृद्धि को गति मिली। 1982 में मालदीव ने पुनः कामनवेल्थ से जुड़ने का निर्णय किया। 

वर्ष 1988 में गयूम को सत्ता से अपदस्थ करने के उद्देश्य से श्रीलंकाई भाड़े के सैनिकों (Mercenaries) ने भारतीय कमांडो की मदद से सैन्य तख्तापलट (Military Coup) का प्रयास किया। वर्ष 1998 में एक राष्ट्रपति जनमत संग्रह (Presidential Referendum) में मौमून अब्दुल गयूम पुनः 5 वर्ष के कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गये। गयूम के शासनकाल में उन पर अधिनायकवादी तथा तानाशाही शासन संचालन के कई आरोप लगाये गये। प्रतिद्वन्दियों एवं विरोधियों का उत्पीड़न करने के लिए उन पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया। लोगों के अवैध तरीके से निरुद्ध कर लेने की घटनाएं भी गयूम के शासनकाल में बढ़ी। 2003 में सरकार-विरोधी दंगे शुरू हुए और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मालदीव सरकार पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाया। इसके बावजूद गयूम 2003 में 6वें कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गये। 2004 में उन्होंने राष्ट्रपति की कार्यकाल में संवैधानिक परिवर्तन करने और राजनीतिक दलों के निर्माण हेतु अनुमति देने का वायदा किया। 2004 में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के चलते आपातकाल लगा दिया गया। उसी वर्ष सुनामी ने मालदीव के जनजीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया था। वर्ष 2005 में मालदीव की संसद ने सर्वसम्मति से बहुदलीय राजनीति को अनुमति देने के पक्ष में मतदान किया। 

अगस्त 2005 में विरोधी दल के नेता मोहम्मद नशीद पर आतंकवाद व देशद्रोह (Sedition) का मुकदमा चलाया गया। तत्कालीन मालदीव सरकार का कहना था कि मोहम्मद नशीद ने राष्ट्रपति गयूम की जमकर आलोचना की जिसके चलते मालदीव में हिंसा भड़की। मार्च 2006 में एक बार फिर राष्ट्रपति गयूम ने लोकतांत्रिक सुधारों के रोडमैप का उद्घाटन किया और इसे बहुदलीय राजनीति के संवर्धन में सहायक बताया। गयूम के काल में आतंकी गतिविधियां भी पनपने लगी थीं। गयूम के शासन से उपजे असंतोष के चलते 2008 में हुए राष्ट्रपति चुनाव के साथ बहुदलीय राजनीति, संसदीय लोकतंत्र की शुरूआत हुई और विपक्षी नेता मोहम्मद नशीद राष्ट्रपति बनें। 

मालदीव में वर्ष 2008 का सत्ता परिवर्तन 


वर्ष 2008 में मालदीव में हुए सत्ता परिवर्तन को मालदीव की राजनीति और स्थिरता की दृष्टि से एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। सत्ता संभालते ही नशीद ने प्रगतिशील व आधुनिक मालदीव के पक्ष में निर्णय लेने शुरू किये जो उनके परंपरा व यथास्थितिवाद (Status-Quo) पसंद विरोधियों को नापसंद आये। नशीद की प्रगतिशीलता उन्हें भारत के करीब ले जाती नजर आयी जबकि नशीद के विरोधी चीन से मधुर रिश्तों के समर्थक थे। नशीद ने वर्ष 2009 में मालदीव को पूर्ण रूप से कार्बन-तटस्थ (Carbon Neutral) बनाने और नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के विकास की बात की। उन्होंने यह भी निर्णय लिया कि मीडिया की स्वतंत्रता व प्रतिस्पर्द्धा को सुनिश्चित करने के लिए राज्य नियंत्रित मीडिया को विनियमन से मुक्त किया जायेगा। राष्ट्रपति नशीद के विरोधियों ने संसद व सरकार के काम काज को ठप्प कर दिया। खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों पर विपक्षी दलों के नेतृत्व वाले प्रदर्शनकारियों व पुलिस में संघर्ष होना शुरू हो गया था। नशीद सरकार के खिलाफ पुलिस के विद्रोह (Mutiny) हो जाने और मालदीव के मुख्य न्यायाधीश की गिरफ्तारी के बाद विरोध प्रदर्शन बढ़ गये और एक तख्तापलट (Coup) के जरियें राष्ट्रपति नशीद को सत्ता छोड़ने के लिए विवश किया गया। फरवरी 2012 में राष्ट्रपति नशीद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और मालदीव के उपराष्ट्रपति मोहम्मद वाहीद हुसैन राष्ट्रपति बनाये गये। पूर्व राष्ट्रपति नशीद पर अवैधानिक तरीके से मुख्य न्यायाधीश को गिरफ्तार करने के आदेश जारी करने का आरोप लगाया गया। 

राष्ट्रपति नशीद को गलत तरीके से निरुद्ध (Detain) कर लिये जाने से उनके पक्ष में विरोध प्रदर्शन उभरा। उनके समर्थकों ने तुरंत नये चुनाव कराये जाने की मांग करते हुए प्रदर्शन किया। 

अगस्त 2012 में कामनवेल्थ-समर्थित जाँच


कॉमनवेल्थ समर्थित जाँच पडताल (Commonwealth-Backed Investigation) ने इस दावे को खारिज कर दिया कि किसी तख्तापलट (Coup) के चलते राष्ट्रपति नशीद अपने पद से हट गये थे। रिपोर्ट का कहना था कि राष्ट्रपति नशीद ने स्वैच्छिक रूप से त्यागपत्र दिया है। अक्टूबर, 2013 में मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2013 में आयोजित राष्ट्रपति चुनावों को कथित अनियमितताओं के आधार पर रद्द घोषित किया था। इसके बाद अब्दुल्ला यामीन ने भूतपूर्व राष्ट्रपति नशीद को 3 प्रतिशत मतों के अंतर से हराया। इसके बाद से ही भूतपूर्व राष्ट्रपति नशीद के खिलाफ सत्ता का दुरुपयोग करने का प्रयास जारी रहा। फरवरी, 2015 में उन्हें पुनः गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कराने की घटना ने विश्व समुदाय का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। 


भारत-मालदीव संबंधों के मध्य चीन


मालदीव चीन की हिन्द महासागर को घेरने की ‘मोतियों की लड़ी’ (String of Pearls) की नीति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। भारत और चीन दोनों ने ही मालदीव में नौसैना अड्डे (Naval Base) स्थापित करने में रुचि दिखायी है। दोनों ही राष्ट्रों ने हाल ही मालदीव में हुए जल संकट के समय जल आपूर्ति कर मजबूत संबंध बनाने की दिशा में कार्य करने का संकेत दिया है। उल्लेखनीय है कि मालदीव ने वर्ष 2014 में माले के उथुरु थिला फलहू (Uthuru Thila Falhu) में एक नौसैनिक अड्डे को विकसित करने में भारत की मदद मांगी हैं जिस पर भारत विचार कर रहा है। ऐसा माना जाता है कि चीन ने भी इस अड्डे के विकास में सहायता देने का प्रस्ताव मालदीव से किया है। फरवरी, 2012 में सत्ता से हटने के बाद राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने स्पष्ट किया था कि देश के सैन्य बलों का उन पर अत्यधिक दवाब था कि वे चीन से एक प्रतिरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करें, और अवसंरचनात्मक तथा नौसैनिक अड्डे के विकास में चीन का सहयोग लें। उल्लेखनीय है कि चीन मालदीव में एक पूर्णकालिक ‘स्थायी दूतावास’ (Embassy) की स्थापना की दिशा में प्रयास कर चुका है। भारत के दक्षिण पश्चिम में स्थित मालदीव में इस दूतावास की स्थापना के चीनी प्रयास ने भारतीय प्रतिरक्षा तंत्र के विशेषज्ञों में एक गंभीर बहस छेड़ दी थी। चीन की मालदीव में रुचि का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि चीन मालदीव में मारन्धू और इहावन्धू द्वीपों (Maarandhoo and Ihavandhoo Islands) में ट्रांससिपमेन्ट बंदरगाहों (Transhipment Ports) के विकास में रुचि रखता है। इसके अलावा चीन मालदीव के दूसरे सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय हवाई-अड्डे हानीमाधू (Hanimaadhoo) के विकास में भूमिका अदा करना चाहता है। यहां यह जानने योग्य है कि मालदीव के मारन्धू, इहावन्धू और हानीमाधू द्वीप मालदीव के उत्तर में हा अलिफ एटाल (Ha Alif Atoll) में स्थित है। चीन इन द्वीपों में अपनी उपस्थिति इसलिए चाहता है क्योकि ये द्वीप भारत व श्रीलंका के सबसे नजदीक स्थित हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में इसके अलावा यह बात भी चर्चा का विषय बनी कि चीन ने मालदीव के माराओ द्वीप (Marao Islands) में एक ‘नौसैनिक सबमरीन अड्डा’ स्थापित करने की योजना बनायी है। चीन हाल के समय में पूर्वी अफ्रीका, सेशेल्स, मारीशस, मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और कंबोडिया के साथ समुद्री व अन्य संपर्क साधने की कोशिश में लगा रहा है। 

चीनी भय और मालदीव में भारत


दक्षिण एशिया में चीन के हर तरह के सामरिक मंसूबों, पहलों, गठजोड़ों पर भारत सतर्क निगाह रखता है। पहले कभी स्वेच्छा से एक बड़े भाई न कि हितैषी शक्ति (Big Brother not a benign Power) के रूप में दक्षिण एशिया के देशों की मदद करने में तत्पर रहने वाले भारत की आज विवशता बन गयी है कि वह चीनी मंसूबों के प्रत्युत्तर में ‘सहयोग संबंध व सहायता’ हेतु आगे आये। मालदीव में चीन की बढ़ती रुचि ने ही भारत को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह मालदीव से प्रतिरक्षा संबंधों को मजबूत बनाये और अवसंरचनात्मक विकास में उसे सहयोग दे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में भारत ने मालदीव में स्मगलरों, गन रनर्स और आतंकवादियों के अभियानों के खिलाफ कार्य करने के लिए उसे 260 टन के तेजी से हमला करने वाले हवाई जहाज आईएनएस तिलानचैंग (INS Tillanchang) उपलब्ध कराया था। इसके अलावा भारत द्वारा मालदीव को 2013-14 तक दो नौसैनिक एडवांस्ड लाइट हेलीकाप्टर ‘ध्रुव’ प्रदान किया गया। इस पर मालदीव का मानना था कि उन्नत हल्के विमान ‘ध्रुव’ की प्राप्ति से उसके कोस्टगार्ड (तटरक्षकों) को खोज, बचाव कार्य और लोगों को असुरक्षित स्थान से हटाने (Evacuation) में मदद मिलेगी। इसके अलावा यह विचारणीय है कि भारत की नौसैना ने मालदीव नेशनल डिफेंस फोर्स के क्षमता निर्माण में विशेष योगदान किया है। मालदीव के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में पेट्रोलिंग के लिए भारत जहाज व एयरक्राफ्ट्स भेज चुका है, साथ ही मालदीव ने हिन्द महासागर क्षेत्र में निगरानी व चौकसी (Surveilance) और एन्टीपायरेसी पेट्रोल करके सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इसके अलावा मालदीव ‘इंडियन ओशेन नेवल सिम्पोजियम’ (IONS) जैसे फोरमों में सहभाग करता है और ‘मिलन’ जैसे सैन्य अभ्यासों में भी उसने अपनी भागीदारी दर्ज करायी है। भारत का एक उन्नत हल्का विमान (ALH) दक्षिणी मालदीव के अडू (Addu) में प्रचालनीय अवस्था (Operational Stage) में है। 

मालदीव के वर्तमान राजनीतिक संकट के संदर्भ में भारत-मालदीव तथा मालदीव-चीन संबंधों के विश्लेषण का औचित्य 


मालदीव में हालिया राजनीतिक संकट का प्रभाव भारत पर पड़ना स्वाभाविक है। इन प्रभावों का मूल्यांकन निम्नांकित बिंदुओं के आधार पर किया जा सकता हैः 

  • मालदीव में इस्लामी उग्रवाद, इस्लामिक कट्टरता के प्रसार को बढ़ावा क्योकि नशीद विरोधी गुट धर्म और पंरपराओं की राजीति करते हैं। ऐसा खासकर विभिन्न छोटे मोटे राजनीतिक दलों की सक्रियता से स्पष्ट है। 

  • मालदीव का चीन के अधिक नजदीक आना वर्तमान राजनीतिक संकट के महत्त्वपूर्ण प्रभावों में से एक माना जा रहा है। वैसे इसकी शुरुआत 16 दिसंबर, 2014 से ही हो गई है जब बीजिंग में आर्थिक एवं व्यापार सहयोग पर चीन-मालदीव संयुक्त समिति की प्रथम बैठक आयोजित की गयी। चीन मालदीव को मैरीटाइम सिल्क रोड के गठन में भागीदार बनाने के लिए भी प्रयास कर रहा है। 

  • 4-5 फरवरी, 2015 के दौरान मालदीव की राजधानी माले में ‘चीन-मालदीव मुक्त व्यापार क्षेत्र के गठन संबंधी संयुक्त व्यवहार्यता अध्ययन हेतु बैठक’ का आयोजन हुआ। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 में दोनों राष्ट्रों के मध्य द्विपक्षीय व्यापार पिछले वर्ष की तुलना में 6.7 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के साथ 104 मिलियन डॉलर पहुंच गया। आर्थिक संबंधों में बढ़ती इस घनिष्ठता के अपने ही मायने हैं। 

  • सितंबर, 2014 में चीन व मालदीव के मध्य कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों से संबंधित समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। ये हैः  

    (क) सहयोग को मजबूती देने हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर। 
    (ख) व्यापार व आर्थिक सहयोग पर संयुक्त समिति बनाने हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर। 
    (ग) माले-हुलहुल (Male-Hulhule) ब्रिज प्रोजेक्ट के निर्माण को समर्थन देने हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर। 
    (घ) समुद्री सहयोग पर एमओयू। 
    (ड़) पर्यटन अवसंरचना के विकास में सहयोग हेतु ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षर। 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि चीन व मालदीव के मध्य बढ़ती नजदीकी भारत के परेशानी का सबब बन सकती है। ऐसा नहीं है कि दो राष्ट्रों के मध्य नजदीकी नहीं होनी चाहिए। दो स्वतंत्र संप्रभु राज्य अपने संबंधों को जैसा चाहें, वैसी दिशा व दशा दे सकते हैं लेकिन संबंधों की मंशा सही होनी चाहिए। चीन की मंशा जब जाहिर है और एक लघु द्वीपीय देश मालदीव को अपने विकास के लिए अवसर का लाभ उठाना कुछ हद तक स्वाभाविक भी है, जायज भी। अब जबकि स्पष्ट है कि चाहे क्षेत्रीय राजनीति हो, चाहे वैश्विक राजनीति, चलती वह क्रूर यथार्थ और हित संरक्षण के दायरे में ही ही है तो भारत को इस यथार्थ को समझ कर वर्तमान मालदीव संकट के प्रभावों से निपटना होगा। 

वर्तमान संकट से उपजी भारत की चिंता और समाधान की दिशा में प्रयास 


मालदीव में वर्तमान राजनीतिक संकट कई दृष्टियों से भारत के समक्ष चिंता खड़ी करता नजर आ रहा है। उल्लेखनीय है कि मालदीव के वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम 25 फरवरी, 2015 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में 2 दिन की यात्रा पर गये। इस यात्रा की कई तरह की व्याख्याएं की जा सकती हैं। पहली तो यह कि मालदीव और पाकिस्तान दोनों सार्क के सदस्य हैं। अब्दुल्ला यामीन अब्दुला गयूम के नेतृत्व वाली वर्तमान मालदीव सरकार जिसका चीन की तरफ झुकाव हाल के समय में बढ़ा है, नही चाहती कि भारत समर्थक नशीद के मामले पर भारत मालदीव में कोई हस्तक्षेप, पहल अथवा सक्रियता दिखाये। विचारणीय है कि सार्क के मंच पर राजनीतिक विवादों को नहीं उठाया जाता है। ऐसे में मालदीव पाक मिलकर सार्क सदस्यों में वर्तमान संकट को मालदीव का अपना निजी मामला सिद्ध कराने की सर्वसम्मति खोज सकते हैं। पाकिस्तान बड़े मन से इस कार्य में मालदीव का साथ इसलिए भी दे सकता है क्योंकि उसकी भी अति घनिष्ठता चीन से छिपी नहीं है। पाकिस्तान के साथ नाभिकीय ऊर्जा संबंधों को मजबूती देने में चीन ने हाल के समय में खासा दिलचस्पी दिखायी है। अब देखना यह है कि भारत दक्षिण एशिया में विवादित राजनीतिक प्रसंगों पर अपनी साख कैसे बचा पाता है
। 

5 फरवरी, 2015 को मालदीव के भूतपूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम भारतीय प्रधानमंत्री के बुलावे पर दिल्ली सतत विकास समिट, 2015 में भाग लेने भारत आये, जहां भारतीय प्रधानमंत्री ने उनसे मालदीव के साथ भारत के घनिष्ठ संबंधों के विविध पहलुओं पर चर्चा की। भारतीय प्रधानमंत्री ने भूतपूर्व राष्ट्रपति गयूम से कहा कि इस क्षेत्र (दक्षिण एशिया) में शांति और सुरक्षा को सुनिश्चित करने में दोनों राष्ट्रों के हितों में समानताएं हैं। एक स्थिर, शांतिपूर्ण व समृद्ध मालदीव के निर्माण में हर संभव सहयोग का वायदा भारत की तरफ से किया गया। भारतीय प्रधानमंत्री का मालदीव दौरा मार्च 2015 में प्रस्तावित है जो राजनीतिक संकट के गहराने पर स्थगित भी हो सकता है। कुल मिलाकार भारत को मालदीव के साथ अन्य दक्षिण एशियाई राष्ट्रों को अधिक से अधिक विश्वास में लेना होगा, हर मदद का प्रस्ताव करना होगा, ताकि मालदीव और उसके समर्थक देशों पर पर एक नैतिक दबाव बना रहे और वे भारत के हितों के खिलाफ कार्य न कर सकें। 

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