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किराए की कोखः कानूनी व नैतिक परिप्रेक्ष्य में विचार

Posted By : Mr. Gaurav     Posted Date : Jun 02,14   Hits : 8158    

हाल के दिनों में शाहरुख खान द्वारा सरोगेसी से बच्चा पैदा करने की खबर अखबारों में सुर्खी बनी हुई थी, उससे पूर्व भी जापानी बालिका बेबी मांजी यामादा भारत में सरोगेसी से पैदा होने के कारण सुर्खियों में थी और इन घटनाओं ने विज्ञान के मानव जीवन में गहराते प्रभाव को स्पष्टतः रेखांकित किया है।

अपनी नवीन पीढ़ी को देखना, वंश वृद्धि, संतान प्राप्ति का सुख सदैव से मानवीय जीवन की एक आकांक्षा रहा है और इसी आकांक्षा ने विवाह जैसी संस्था व परिवार को दृढ़ता प्रदान की है। यद्यपि यह भी स्पष्ट है कि वर्तमान दौर में इन संस्थाओं के महत्त्व में तुलनात्मक कमी हुई है; युवा-पीढ़ी विवाह से दूर सह-जीवन को अधिक मान्यता देने लगी है और अनेक एकल युवक-युवतियाँ विवाह व संतानोत्पत्ति जैसी सामाजिक परिघटनाओं से स्वयं को मुक्त रखने के पक्ष में हैं।


‘सरोगेसी’ जिसे आम बोलचाल में ‘किराए की कोख’ कहा जाता है, इसी बदलती मानसिकता के परिणामस्वरूप वर्तमान भारतीय चिकित्सा जगत में प्रचलित धारणा के रूप में उभरी है।

सरोगेसी के माध्यम से संतान प्राप्ति ने न केवल युवा-पीढ़ी की बदलती मानसिकता को साकार रूप दिया है बल्कि निःसंतान दंपतियों, एकल व्यक्ति, किन्नरों और समलैंगिकों आदि के लिए भी अपने परिवार कायम करने के रास्ते खोल दिए हैं। भारत के परिप्रेक्ष्य में सरोगेसी का विशिष्ट महत्त्व, विदेशियों द्वारा भारतीय महिलाओं को अपनाने से है जिसने सरोगेसी के साथ अनेक नैतिक, मानवीय, आर्थिक, चिकित्सकीय एवं राजनीतिक मुद्दे पैदा किए हैं।

जहाँ तक सरोगेसी के वैज्ञानिक-तकनीकी पक्ष की बात है, सरोगेसी वह व्यवस्था है जिसमें कोई महिला ‘सहायताकारी पुनरुत्पादक तकनीक’ (ART) के जरिए एक ऐसा गर्भ धारण करने को तैयार होती है जिसमें उसका अंडाणु नहीं होता है। इस गर्भ को धारण करने का उद्देश्य होने वाले बच्चे को उस दंपति को सौंपना होता है जिसके लिए वह गर्भ धारण करती है।


सरोगेसी की इस प्रक्रिया में सरोगेट माँ उचित भुगतान की राशि प्राप्त करती है किंतु जन्म देने वाले बच्चे पर उसका कोई अधिकार नहीं रहता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में ही एक प्रकार की संवेदनहीन व्यावसायिकता का उदय होता है और ऐसी स्थिति में ही राज्य द्वारा समुचित हस्तक्षेप किए जाने को आधार मिलता है।


भारत में वर्तमान में ‘सरोगेसी’ की प्रक्रिया काफी लोकप्रिय हो गई है और बहुत से विदेशी लगातार सरोगेसी हेतु भारतीय महिलाओं से अनुबंध करते हैं तथा ART क्लीनिक इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। ये क्लीनिक संतानहीन दंपति से भारी कीमत वसूल करके सरोगेसी के जरिए उन्हें बच्चा पैदा करने की सुविधा देते हैं।


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ‘सरोगेसी’ से जुड़े जो विविध मुद्दे, प्रश्न, आलोचनाएँ और आशंकाएँ हैं, उन्हें निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. सरोगेसी से जुड़ा सबसे जटिल प्रश्न जो है वह पैदा हुए बच्चे की नागरिकता का मुद्दा है। अनेक अवसर पर संबंधित देश के कानून बच्चे को नागरिकता हासिल करने में बाधा बनते हैं तो दूसरी ओर उसे भारतीय नागरिक न मानकर उसके वापस अपने देश लौटने का प्रश्न उत्पन्न हो जाता है।

  2. सरोगेट माँ को यद्यपि एक निश्चित राशि, सरोगेसी के लिए प्रदान की जाती है ताकि गर्भावस्था के दौरान वह पोषित बनी रहे और स्वस्थ बच्चे को जन्म दे किंतु यह सुनिश्चित करना कठिन प्रश्न है कि वह महिला वास्तविक तौर पर इस तथ्य पर समुचित ध्यान दे और अक्सर प्राप्त राशि का इस्तेमाल अन्य कार्यो में किया जाता है जबकि सरोगेसी से बच्चा पैदा करने की कठिनाइयाँ, गर्भावस्था की चुनौतियाँ, महिला की स्वयं की बीमारियाँ सरोगेट माँ व बच्चे के स्वास्थ्य के प्रति गंभीर चुनौतियाँ पैदा कर सकती हैं।

  3. सरोगेसी ने यह प्रश्न भी पैदा किया है कि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो जाएँ जब संतान चाहने वाला दंपति महिला के साथ अनुबंध तोड़ दे और पैदा होने वाले बच्चे को अपनाने से इनकार कर दे। ऐसी परिस्थिति में बच्चे के पालन-पोषण व परवरिश की पूर्ण जिम्मेदारी संबंधित सरोगेट माँ के लिए चुनौती बन जाती है।

  4. सरोगेसी से जुड़ा मुद्दा संबंधित महिला के शोषण के रूप में भी उत्पन्न हो सकता है। अनेक परिस्थितियों में गर्भधारण के बाद संबंधित दंपति सरोगेट महिला को भुगतान करने से इनकार कर सकते हैं और ऐसी स्थिति में महिला न तो गर्भपात को अपना सकती है, न ही दंपति से किसी प्रकार की नवीन माँग कर सकती है।

  5. जब विदेशी दंपति भारतीय महिला को सरोगेट माँ के रूप में स्वीकारते हैं तो अनेक बार परस्पर कानूनी विवादों का मुद्दा जटिल बन जाता है। चूंकि इस संबंध में अभी तक कोई स्पष्ट कानून नहीं है तो परस्पर विवादों के समाधान में कठिनाई पैदा होती है, साथ ही साथ विदेशी नागरिकों को भारतीय कानून के दायरे में लाना कठिन हो जाता है।

  6. अनेक बार ऐसी स्थितियाँ भी पैदा हो सकती हैं जब दंपति आर्थिक स्थिति से कमजोर हो जाएँ अथवा दंपति में अलगाव हो जाए तो ऐसी स्थिति में बच्चे के भविष्य व समुचित परिवरिश की समस्या पैदा हो सकती है।

  7. सरोगेसी को अपनाने के पीछे मूलतः मानवीयता की भावना निहित थी और इसे स्वस्थ रूप में अपनाया गया था किंतु हाल के दिनों में सरोगेसी का निकृष्टतम रूप ‘व्यावसायिक सरोगेसी’ के रूप में सामने आया है जिसे किसी भी रूप में स्वीकार्य व उचित नहीं माना जा सकता। पेशेवर महिलाएँ केवल अधिकाधिक पैसा कमाने के उद्देश्य से सरोगेसी को धारण करने को तैयार हो जाती हैं जो समाज में बढ़ रहे नैतिक मूल्यों के पतन को प्रकट करता है।

  8. ‘व्यावसायिक सरोगेसी’ के प्रचलन ने एक प्रकार की संवेदनहीनता को पैदा किया है जिसमें सरोगेट माँ केवल मशीनी व्यवहार करती है। ‘किराए की कोख’ शब्दावली से ही इस संवेदनहीनता का बोध होता है वहीं अनेक बार इस प्रक्रिया से उत्पन्न बच्चे व उसके जैविक माता-पिता में भी कोई समुचित पारिवारिक संबंधों का विकास नहीं हो पाता जो बच्चे के व्यक्तित्व पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।

  9. सरोगेसी की संपूर्ण प्रक्रिया ने परंपरागत भारतीय मूल्यों को चुनौती प्रस्तुत की है जो नैतिकता से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है। सरोगेसी की अवधारणा के बढ़ते चलन ने ‘विवाह’ जैसी भारतीय संस्था पर ही प्रश्नचिह्न उत्पन्न कर दिए हैं और इससे ‘परिवार’ संस्था के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़े हो गए हैं क्योंकि एकल जनक भी सरोगेसी के माध्यम से संतान पा सकते हैं।

  10. सरोगेसी को विनियमित किए जाने के संबंध में अभी तक कोई समुचित व व्यवस्थित कानून नहीं बना है और गृहमंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देश ही मूलतः इस संबंध में अपनाए जाते हैं जिससे अनेक जटिल मुद्दे अनुत्तरित रह जाते हैं। सरोगेसी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले ART क्लीनिक भी अभी तक समुचित निगरानी के अंदर नहीं आ पाए हैं और ये ऐसी चुनौतियाँ हैं, जिन पर समुचित ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।


सरोगेसी से जुड़े मुद्दों की गंभीरता को देखते हुए निवर्तमान सरकार के द्वारा ‘सहायताकारी पुनरुत्पादक तकनीक विधेयक 2013’ को तैयार किया गया जिसके विविध प्रावधान भारत में सरोगेसी के समुचित विनियमन को स्पष्ट करते हैं-

  1. सरोगेसी से बच्चा हासिल करने की अनुमति केवल निःसंतान भारतीय दंपति, प्रवासी भारतीय (NRI), भारतीय मूल के लोग (PIO) और समुद्रपारीय भारतीय नागरिकों (OCI) को ही दी गई है तथा विदेशियों को इससे वंचित कर दिया गया है।

  2. प्रस्तावित ART बिल में केवल इनविट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) और भ्रूण ट्रांसफर की ही अनुमति प्रदान की गई।

  3. ART बिल 2013 के माध्यम से सुनिश्चित किया गया कि सरोगेट महिला को 5 किश्तों में अनुबंधित राशि का भुगतान हो।

  4. सरोगेसी से संतान हासिल करने को एकल व्यक्ति, किन्नरों व समलैंगिकों को भी वंचित कर दिया गया है।

  5. बिल के प्रावधानों के अनुसार महिला अपने बच्चों सहित पाँच संतानों के सफल जन्म के बाद सरोगेट माँ नहीं बन सकेगी।

  6. बिल के अनुसार सरोगेट माँ की न्यूनतम आयु 21 वर्ष व अधिकतम आयु 35 वर्ष होगी।

  7. बिल के अनुसार सरोगेट महिला व दंपति के मध्य विस्तृत सहमति पत्र हस्ताक्षरित किया जाएगा जिसमें सरोगेसी व प्रजनन से संबंधित सभी गंभीरताओं व चुनौतियों का विस्तृत उल्लेख हो।

  8. बिल के प्रावधानों में सरोगेट महिला व बच्चे का बीमा अनिवार्य किया गया है।

  9. ART बिल के प्रावधानों के अनुसार एक स्थानीय संरक्षक का प्रावधान भी किया गया है जो जोड़े के मना करने पर पैदा होने वाले बच्चे को संरक्षण देगा।


स्पष्ट है कि ART बिल के लागू होने पर सरोगेसी से जुड़े तकनीकी, वैधानिक मुद्दों व जटिलताओं को हल किया जा सकेगा और इस संबंध में अभी जो विरोधााभास रह गए हैं, उन्हें सुलझाया जा सकेगा।


विदेशियों को अनुमति न देना अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक प्रतीत होता है क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा की आवक में कमी होगी तथा यह ‘मेडिकल पर्यटन’ के बढ़ रहे भारतीय उद्योग क्षेत्र को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।


सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय जो एकल व्यक्ति को बच्चा गोद लेने व धारण करने का अधिकार देते हैं तथा हाल में किन्नरों के पक्ष में दिया गया निर्णय कि उन्हें भी परिवार कायम करने, संतान रखने व बच्चे धारण करने का अधिकार है, से प्रस्तावित ART बिल 2013 के प्रावधान विरोधाभासी हैं अतः इस संबंध में समुचित बदलाव व बिल के प्रावधानों में परिवर्तन किए जाने की जरूरत है।


जहाँ तक विदेशियों को अनुमति न देने का प्रश्न है, उसे वर्तमान परिदृश्य में बदलने की जरूरत है क्योंकि यह भारतीय अर्थव्यवस्था व चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की वैश्विक पहचान व स्वीकृति को प्रमाणित करता है। इस संबंध में जो भी आशंकाएँ हैं, उनका समाधान सरोगेसी को विदेशियों के लिए प्रतिबंधित करना नहीं है बल्कि इस संबंध में समुचित विनियमन व निर्देशन एक उचित व व्यावहारिक कदम होगा।

 

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