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बौद्धिक संपदा अधिकार विवाद और उसके पहलू

Posted By : Mr. Vivek Ojha     Posted Date : Jan 10,15   Hits : 6654    

(Intellectual Property Right Dispute and its aspects )



पृष्ठभूमि


आज से कई शताब्दियों पूर्व महान विद्वान अरस्तू ने कहा था कि व्यक्ति एक ‘सामाजिक पशु’ है। आदिम समय में सभ्यता व संस्कृति का विकास अत्यंत सीमित होने के कारण व्यक्ति को पाशविक मनोवृत्तियों, आचरणों का दास माना जाता था परंतु उसमें सामाजिकता की भी संभावनाएं देखी गयी थी। अराजकता एवं अव्यवस्था होने के चलते विभिन्न संपदाओं पर कहीं ‘व्यक्तिगत स्वामित्व’ के लिए संघर्ष तो कहीं ‘सामूहिक स्वामित्व’ की वकालत की जाती थी। एक तरफ यूरीपाइड्स (यूनानी विचारक) ने अपनी पुस्तक प्रोटेस्टिलॉस में और प्लेटों ने ‘दि रिपब्लिक’ में स्त्रियों अथवा पत्नियों को सांझी संपदा माना और संपत्ति के साम्यवाद की बात की तो दूसरी तरफ हॉब्स जैसे राजनीतिक दार्शनिकों ने संपदाओं पर व्यक्तिगत स्वामित्व को मान्यता दी। हाब्स की दृष्टि में बलपूर्वक जो किसी भी वस्तु को प्राप्त करे, वह उसकी संपदा हो जाती है। चर्च व पुरोहितों ने संपदाओं को दैवीय अनुकंपा माना। किसी कार्य में लगाये गये श्रम को लॉक ने संपदा के स्वामित्व का निर्धारक माना, वहीं मैक्सवेबर ने अपने प्रोटेस्टेन्ट धर्म की धारणा के तहत् कार्य करने वाले उद्यमियों व पूंजीपतियों को संपदा का स्वामी बताया।

वस्तुतः जब तक कला, साहित्य, संस्कृति, लोकतांत्रिक मूल्यों, सभ्य सामाजिक-सांस्कृतिक आर्थिक प्रतिमानों का विकास नहीं हुआ, तब तक व्यक्ति की बौद्धिकता, रचनात्मकता नवाचारी दृष्टिकोण का संतुलित विकास भी संभव नही हुआ। यद्यपि प्राचीन समय में ज्ञानी, विद्वान हुआ करते थे, उनके पास अच्छे मौलिक विचार थे, उनके द्वारा कृतियां लिखी जाती थी, व्यापार वाणिज्य में अनौपचारिक ढंग से प्रतीकों, डिजाइनों का प्रयोग भी होता था, साथ ही स्थान विशेष की वस्तु अथवा उत्पाद भौगोलिक आधारों पर विवाद का कारण नहीं बनती थी परंतु आज के वैश्वीकरण उदारीकरण व निजीकरण के युग की तुलना में पूर्व के समय में बौद्धिक संपदा संरक्षण के लिए किसी खास औपचारिक व वैधानिक ढांचे की आवश्यकता नहीं थी। किसी अन्य लेखक के भाषा, विचार, अभिव्यक्तियों को अपना बताकर उसे प्र्रकाशित करने (plagiarism) की आवश्यकता नहीं थी, न ही पाइरेसी की समस्या थी।

चूंकि आज की तुलना में प्राचीन समय में रचनात्मकता, बौद्धिकता व ज्ञान कौशल का व्यावसायिक इस्तेमाल करने की मनोवृत्ति विकसित नहीे हुई थी इसलिए बौद्धिक संपदा अधिकार एवं उसका संरक्षण एक महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं था, परंतु वर्तमान समय में ज्ञान, विवेकशीलता, रचनात्मकता को पूंजी माना जाता है। मिशेल फूको का मत है कि, ‘ज्ञान शक्ति है। ज्ञान को प्राप्त करने के सभी तरीके शक्ति को प्राप्त करने के तरीके हैं।’ ज्ञान वर्तमान में ‘नवाचार’ 'उद्यमिता’ को आधारस्तंभ बनाकर पूंजी सृजन का सशक्त माध्यम बन गया है और जिस कारक के चलते इन साधनों को बचाने अथवा बौद्धिक संपदा अधिकार संरक्षण की जरूरत है, वह है ‘अस्वस्थ और अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा’। व्यक्ति, समुदाय, राष्ट्र सभी इस  प्रतिस्पर्धा की दौड़ में आगे निकल जाना चाहते हैं। श्रेष्ठ व सर्वोत्तम बनने की महत्वाकांक्षा में पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट भौगोलिक संकेतकों के नियमों, कानूनों का उल्लंघन किया जाता है।

बौद्धिक संपदा अधिकार एवं विवाद के मुद्दे

महात्मा गांधी ने वर्तमान समय के 7 संरचनात्मक सामाजिक पापों (Social Sins) का उल्लेख करते हुए कहा था कि ये ऐसे घातक पाप/अपराध हैं जो हमें नष्ट कर देगें। इनमें शामिल हैः कार्यविहीन संपदा या धन, अंतःकरण विहीन आनंद (Pleasure Without Conscience) ज्ञान विहीन चरित्र, नैतिकिता एवं आचार विहीन वाणिज्य एवं व्यवसाय, मानवताविहीन विज्ञान, त्यागविहीन धर्म और सिद्धांतविहीन राजनीति। इन पापों में नैतिकता एवं आचार विहीन वाणिज्य एवं व्यवसाय बौद्धिक संपदा अधिकार के विवादों पर लागू होने वाली धारणा है।

बौद्धिकता एवं रचनात्मकता की चोरी ‘अस्मिता की चोरी’ (identity theft) है। विभिन्न संदर्भ ग्रंथों, पुस्तकों आदि से आवश्यक सूचनाएं, तथ्य को हुबहू नकल कर अपनी मौलिक रचना के रूप में पेश करने से कॉपीराइट विवादों को जन्म मिलता है। कुछ समय पूर्व भारतीय मूल के विदेशी पत्रकार, लेखक फरीद जकारिया जो ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के लिए कॉलम लिखते हैं, पर कापीराइट नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। जकारिया को जील लेपोर के लेख को हुबहू नकल (Plagiarize) कर  टाइम व सीएनएन’ कॉम में प्रकाशित करने का दोषी पाया गया। टाइम मैगजीन व सीएनएन ने उन्हें इस अपराध के लिए निलंबित कर दिया था। एक अन्य बौद्धिक संपदा अधिकार विवाद नोवारटिस मामलें में देखा जा सकता है। नोवारटिस ने ल्यूकेमिया की औषधि ग्लिवेक को भारत में पेटेंट कराने का प्रयास किया लेकिन यह भारतीय पेटेंट अधिनियम की धारा 3(d) के उस मानक को पूरा नहीं करता जिसके अनुसार एक ज्ञात तत्व/पदार्थ (Known Substance) के केवल नये रूप में खोज (mere discovery  of a new form) के आधार पर पेटेंट नहीं कराया जा सकता जब तक कि यह उस तत्व/पदार्थ की ‘औषधीय प्रभावोत्पादकता’ (therapeutic efficacy) में सुधार न करें। इसी आधार पर नोवारटिस के पेटेंट आवेदन को भारत में अस्वीकार कर दिया गया था।

वैश्विक स्तर पर भी बौद्धिक संपदा अधिकार विवाद अक्सर उभरते हैं। ब्राजील के बौद्धिक संपदा कार्यालय ने कुछ समय पूर्व एप्पल के आइफोन ट्रेडमार्क आवेदन (स्मार्टफोन के विक्रय के लिए) को नामंजूर किया था। इसके अलावा एप्पल और सैमसंग के मध्य भी पेटेंट विवाद देखा गया। कुछ समय पूर्व नेसले के विरोध के उपरांत यूनाइटेड किंगडम के न्यायालय के निर्देशों के उपरांत कैडबरी (चाकलेट निर्माता) को अपने अपने पर्पल टेडमार्क से हाथ धोना पड़ा था। जुलाई 2013 में फ्रेंच कंपनी कैसटेल (castel) द्वारा एक चीनी प्रतिद्वंदी ट्रेडमार्क का उल्लंघन करने के अपराध में 5 मिलियन डॉलर का जुर्माना देना पड़ा था।

हाल ही में दिसंबर 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने चीनी कंपनी शियाओमी (Xiaomi) के स्मार्टफोन भारत में बेचने पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया है क्योकि स्वीडिश कंपनी एरिक्सन के साथ इसके पेटेंट विवाद हैं। इस प्रकार देखों तो हर दिन भारी मात्रा में बौद्धिक संपदा अधिकारों के हनन के मुद्दे और संबंधित विवाद सामने आते हैं। वर्तमान वाणिज्यिक युग में गला काट प्रतिस्पर्धा  (cut throat competition) ने इन विवादों को बढ़ा दिया है। अतः इन विवादों से निपटने में वैश्विक स्तर पर वाइपो (WIPO) जैसी जिम्मेदार संस्थाओं व राष्ट्रीय/क्षेत्रीय स्तरों पर पेंटट विधायनों, संस्थाओं, कार्यालयों को अधिक विशेषज्ञता, दक्षता व अनुभव के साथ कार्य करने की जरूरत है।

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